Thursday, February 27, 2014

अचरज


कभी सोचा है तुमने कोई रंग,
किस तरह इतना पक्का हो जाता है,
मन से उतरा भी तो,
रूह पे चढ़ जाता है,
गांठ पड़ी और धागा कैसे,
इतना मजबूत हो जाता है.....


4 comments:

Rajendra kumar said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.02.2014) को " शिवरात्रि दोहावली ( चर्चा -1537 )" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ।

moulshree kulkarni said...

protsahan hetu bahut bahut dhanyawaad...

संजय भास्‍कर said...

सुंदर रचना के लिए आपको बधाई

संजय भास्‍कर
शब्दों की मुस्कुराहट
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

अभिलेख द्विवेदी said...

Gehri abhivyakti aur behatreen rachna...! Bahut khub likha!